बिरसा मुंडा के जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शत शत नमन किया

बिरसा मुंडा सिर्फ़ आदिवासियों के नहीं, हर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ उलगुलान के महानायक हैं

बिहार(DESK): बिरसा मुंडा का जन्म राँची के खूंटी जिले के उलीहातू गाँव में 15 नवंबर 1875 के दशक में एक छोटे से किसान गरीब परिवार में हुआ था परिवार में हुआ था। जैसा मुंडा के पिता का नाम सुगना पूर्ति और माता करणी पूर्ति थे। इन्होंने साल्गा गांव में गोस्नर एवंजिलकल लुथार स्कूल में अपनी प्रारंभिक पढ़ाई पूरी की ये हमेशा ब्रिटिश शासकों द्वारा की गई दशा पर सोचते रहते थे। जब मानसून के छोटे नागपुर पठार में महामारी फैली हुई थी तो बिरसा ने पूरे मनोयोग से अपने लोगों के बीच अंधविश्वास जैसे भूत प्रेत डायन प्रथा से दूर करने के लोगों को प्रेरित किया करते थे

।बिरसा का बचपन अपने घर में, ननिहाल में और मौसी की ससुराल में बकरियों को चराते हुए बीता। बाद में उन्होंने कुछ दिन तक ‘चाईबासा’ के जर्मन मिशन स्कूल में शिक्षा ग्रहण की। परन्तु स्कूलों में उनकी आदिवासी संस्कृति का जो उपहास किया जाता था, वह बिरसा को सहन नहीं हुआ। इस पर उन्होंने भी पादरियों का और उनके धर्म का भी मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। फिर क्या था। ईसाई धर्म प्रचारकों ने उन्हें स्कूल से निकाल दिया।

“मैं केवल देह नहीं

मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ

पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं

मैं भी मर नहीं सकता

मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता

उलगुलान!

उलगुलान!!

उलगुलान!!!”

‘बिरसा मुंडा की याद में’ शीर्षक से यह कविता आदिवासी साहित्यकार हरीराम मीणा ने लिखी हैं। ‘उलगुलान’ यानी आदिवासियों का जल-जंगल-जमीन पर दावेदारी का संघर्ष।

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महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’ का एक अंश है- ”सवेरे आठ बजे बिरसा मुंडा खून की उलटी कर, अचेत हो गया। बिरसा मुंडा- सुगना मुंडा का बेटा; उम्र पच्चीस वर्ष-विचाराधीन बंदी। तीसरी फ़रवरी को बिरसा पकड़ा गया था, किन्तु उस मास के अंतिम सप्ताह तक बिरसा और अन्य मुंडाओं के विरुद्ध केस तैयार नहीं हुआ था… क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की बहुत सी धाराओं में मुंडा पकड़ा गया था, लेकिन बिरसा जानता था उसे सज़ा नहीं होगी, डॉक्टर को बुलाया गया उसने मुंडा की नाड़ी देखी, वो बंद हो चुकी थी। बिरसा मुंडा नहीं मरा था, आदिवासी मुंडाओं का ‘भगवान’ मर चुका था।”

आदिवासी और स्त्री मुद्दों पर अपने काम के लिए चर्चित साहित्यकार रमणिका गुप्ता अपनी किताब ‘आदिवासी अस्मिता का संकट’ में लिखती हैं- ”आदिवासी इलाकों के जंगलों और ज़मीनों पर, राजा-नवाब या अंग्रेजों का नहीं जनता का कब्ज़ा था। राजा-नवाब थे तो ज़रूर, वे उन्हें लूटते भी थे, पर वे उनकी संस्कृति और व्यवस्था में दखल नहीं देते थे। अंग्रेज़ भी शुरू में वहां जा नहीं पाए थे। रेलों के विस्तार के लिए, जब उन्होंने पुराने मानभूम और दामिन-ई-कोह (वर्तमान में संथाल परगना) के इलाकों के जंगल काटने शुरू कर दिए और बड़े पैमाने पर आदिवासी विस्थापित होने लगे, आदिवासी चौंके और मंत्रणा शुरू हुई।” वे आगे लिखती हैं, ”अंग्रेजों ने ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर आदिवासियों के वे गांव, जहां व सामूहिक खेती किया करते थे, ज़मींदारों, दलालों में बांटकर, राजस्व की नयी व्यवस्था लागू कर दी। इसके विरुद्ध बड़े पैमाने पर लोग आंदोलित हुए और उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ विद्रोह शुरू कर दिए।”

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अंग्रेजी हुकूमत ने ‘इंडियन फारेस्ट एक्ट 1882’ पारित कर आदिवासियों को जंगल के अधिकार से वंचित कर दिया था। वही दूसरी तरफ अंग्रेजों ने ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर आदिवासियों के गांवों को ज़मींदारों, दलालों और महाजनों में बांटकर राजस्व की नयी व्यवस्था लागू कर दी थी, जिनपर आदिवासी सामूहिक खेती करते थे। इसके बाद से ही शुरू हुआ अंग्रेजों, जमींदारों व महाजनों द्वारा भोले-भाले आदिवासियों का शोषण।

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इसी शोषण के खिलाफ बिरसा ने आदिवासियों विद्रोह की चिंगारी फूंकी और जल-जंगल-जमीन पर दावेदारी से पैदा हुआ उलगुलान। इस उलगुलान को ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ यानी ‘हमारा देश, हमारा राज’ का यह नारा बिरसा ने जब दिया तब आदिवासियों को लगा जैसे उन्हें उनका भगवान मिल गया।

1894 में छोटा नागपुर में भयंकर अकाल और महामारी फैली। बिरसा ने मात्र 19 साल की उम्र में पूरी तन्मयता और समर्पण के साथ अपने लोगों की सेवा की। उन्होंने लोगों को अन्धविश्वास से बाहर निकल कर बीमारी का इलाज करने के प्रति जागरूक किया। उसी वक्त वे आदिवासियों के लिए ‘धरती आबा’ यानी ‘धरती पिता’ हो गये।

जून का महिना झारखंड के लिए महत्वपूर्ण इसलिए है कि 9 जून को धरती आबा (धरती पिता) बिरसा मुंडा का शहादत दिवस है, अंग्रेजों द्वारा उन्हें 9 जून 1900 को धीमा जहर देकर मार दिया गया था। यही वजह बनती है कि 9 जून को हम बिरसा मुंडा की पुण्य तिथि नहीं शहादत दिवस मनना जरूरी समझते हैं।

वहीं 30 जून को हुल दिवस के रूप में जाना जाता है, क्योंकि 30 जून 1855 को सिदो-कान्हू के नेतृत्व में अंग्रेजों, महाजनों, के खिलाफ एक जोरदार उलगुलान (आंदोलन) हुआ था, जिसमें करीब 20 हजार लोग मारे गए थे।

यह दुहराने की जरूरत नहीं है कि बिरसा मुंडा का जन्म करमी हातू और सुगना मुंडा के घर में 15 नवम्बर 1875 को वर्तमान झारखंड राज्य के रांची जिले में उलिहातु गांव में हुआ था।

बिरसा मुंडा का बचपन ‘होनहार पूत के चिकने पात’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा था। पढ़ाई में उनकी रूचि के कारण समाज के लोगों ने सुगना मुंडा को राय दी कि बिरसा को अच्छे स्कूल में पढ़ाएं। उस वक्त जर्मन स्कूल नाम का एक स्कूल हुआ करता था, जिसमें तेज तर्रार लड़कों का ही दाखिला होता था, मगर इसके लिए पहली शर्त इसाईयत स्वीकार करना जरूरी था। जिसे बिरसा को स्वीकार नहीं था और उसने जर्मन स्कूल में पढ़ना स्वीकार नहीं किया।

आदिवासी सामाजिक संस्था के योगो पुर्ती बताते हैं कि ”वे और उनकी टीम 2014 के आखिरी में पश्चिमी सिंहभूमि के उस क्षेत्र का दौरा किया था, जहां बिरसा मुंडा अपने आखिरी समय में केयंटाइ गांव और जोंकोपई गांव के बीच की पहाड़ी ‘कोरोंटेया बुरु’ पर पनाह लिए हुये थे। हमने बंदगांव प्रखण्ड के टेबो पंचायत रोगोद (रोग्तो) गांव जो बंदगांव से करीब 25 किमी की दूरी पर है और टेबो से 7-8 किमी दूर पोड़ाहाट के जंगलों के बीच बसा है, के सहित जोंकोपाई, कोटागड़ा, संकरा, कुदाबेड़ा, देयाईं, कुकुरूबरू, हलमद, राइगाड़ा आदि का दौरा किया।”

वे बताते हैं कि ”उस वक्त झारखंड विधानसभा का आम चुनाव था, बावजूद इस क्षेत्र में इसकी कोई सुगबुगाहट तो दूर, इसकी कहीं चर्चा तक नहीं थी। गाड़ियों से चुनाव प्रचार तो दूर, कहीं कोई बैनर पोस्टर भी नहीं था। क्षेत्र के लड़कों को कहीं कहीं मैदानी इलाकों में हॉकी खेलते हुए हमने पाया। चूंकि हमें जानकारी मिली थी कि बिरसा मुंडा की पहली गिरफ्तारी रोगोद (रोग्तो) के शंकरा के एक स्कूल से हुई थी, अत: हमलोग उसी गांव में जा रहे थे।”

सिंबुआ पहाड़ है जिसकी चोटी समतल है। उलगुलान के दिनों में बिरसा मुंडा इसी पहाड़ की चोटी पर यदा-कदा बैठकें किया करते थे। यहां से आधे मील पर सरवादा चर्च है जिसपर बिरसा के अनुयायियों ने एक बार तीर चलाया था। क्योंकि चर्च द्वारा धर्म प्रचार करके यहां के लड़कों को इसाईयत की ओर प्रभावित करने की कोशिश की गई थी।

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