पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने लिया बलिराजगढ़ का जायजा

मधुबनी: पुरातत्वविद अधिकारियों का तीन सदस्यीय दल रविवार देर शाम बलिराजगढ का संयुक्त रूप से मुआयना किया। अधिकारियों के इस दल के पहुंचने से इलाकाई लोगों को लगा कि इसके विकास व उत्खनन को लेकर अधिकारियों का दौरा हो रहा है। कितु ऐसा नहीं था।

दल में शामिल भारतीय सर्वेक्षण सहायक अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. जलज कुमार तिवारी ने बताया कि ये दरअसल गढ का इसलिए मुआयना करने पहुंचे हैं कि गढ़ की वास्तविक स्थिति से कोई छेड़ छाड़ तो नहीं हो रहा। इस बात पर दुख जाहिर किया कि उत्तरी-पूर्वी मुख्य द्वारा से सटे उत्तर गढ़ के जमीन को अतिक्रमित किया जा रहा है। अतिक्रमणमुक्ति को लेकर ये प्रशासन को लिखेंगे। गढ़ की चौडी दिवाल, मध्य किले, अंदर के तालाब का मुआयना किए।

साथ ही उन्होंने कहा अब तक के खुदाई में जो अवशेष प्राप्त हुआ है वह 1200 ईसा पूर्व अर्थात 32 सौ वर्ष पुराना हो सकता है। मधुबनी न्यूज़ टीम के द्वारा पूछे जाने पर बताया कि खुदाई कार्य इनके ब्रांच का कार्य नहीं है। बल्कि उत्खनन शाखा के जिम्मे यह कार्य होता है। बताया गया कि वर्ष 2012-13 में जो खुदाई हुई थी उनका लाईसेंस पटना अंचल के अधीक्षण पुरातत्वविद डा मदन सिंह चौहान को मिला था। इनके स्थानांतरण के साथ ही लाईसेंस का रीन्युवल नहीं हो सका। तथा कार्य रूक गया।

महाराजाधिराज लक्ष्मेश्वर सिंह संग्रहालय दरभंगा के अध्यक्ष डॉ. शिवकुमार मिश्र ने मधुबनी न्यूज़ से बातचीत में कहा कि गढ़ की चौडी चहारदीवारी इस बात का सबूत है कि यह किसी साधारण नगर का नहीं है। बल्कि किसी बडे राजा की राजधानी रहा हो। संभावना व्यक्त की कि यह यह राजा विदेह की राजधानी हो सकती है।

बताया बाल्मिकि रामायण में इस बात की चर्चा है कि ब्रम्हपुर,अहिल्यास्थान गौतम कुंड से ईशानकोण की ओर धनुष यज्ञ को राम, लक्ष्मण व विश्वामित्र निकले थे। ईशानकोण में विदेह नगरी की ²ष्टि से बलिराजगढ ही ऐसा स्थल है जो हर दृष्टि से धन्य-धान्य प्रतीत होता है।

इन्होंने वैज्ञानिक ढंग से ध्वस्त दिवालों की सफाई की जरूरत जताया । जिससे अंदर व अगल बगल के अवशेषों की भी जानकारी मिल सकें। कहा इस संदर्भ में इनके द्वारा भारतीय पुरातत्व विभाग के रीजनल डायरेक्टर कोलकाता व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संयुक्त सचिव को पत्र लिखा जाएगा। पुरातत्वविद डॉ. सुशांत कुमार ने कहा कि इस स्थल की उत्खनन से भारतीय इतिहास में विस्तृत इतिहास लिखा जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!