बासोपट्टी में भागवत कथा प्रवचन के पहले दिन

फोटो बसोपट्टो 3 कथा प्रवचन करते बाल ब्यास श्री कृष्ण कृष्ण प्रिया जी महाराज

बासोपट्टी : निज संवाददाता

बासोपट्टी में वृृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक नेे कहा कि जीवन में सत्संग का बड़ा ही महत्व है सत्संग हमें बताता है हम वास्तव में कौन हैं । हम उस परमात्मा का अंश है जो कि आनंद स्वरूप हैं । जब तक सत्संग हमारे जीवन में नहीं आता हम अपने आप को बड़े ही असन्तुष्ट अक्षुण्ण व दरिद्र समझते है,भूल जाते है।हमारा वास्तविक रूप क्या है,जहा शान्ति संतुष्टि व आनंद है व तो हमारा ही स्वरुप है, संसार की भीड़ में अपने आप को खो देते हैं ।

सत्संग हमें जगत और हमारे मूल स्वरूप को हमें बताता है कि हम कौन हैं| श्रीमद् भागवत कथा व्यास जी के द्वारा रचित नहीं है।व तो व्यास जी के द्वारा विस्तृत की गई है  बल्कि श्रीमद् भागवत कथा तो सृष्टि के आरंभ से है भगवान श्री नारायण के मुख की वाणी है ,जो ब्रह्मा जी को श्रवण कराई गई थी। जिससे उन्हें सृष्टि में मोह ममता पैदा ना हो| पूज्या कृष्ण प्रिया जी ने कथा के दौरान यह भी कहा कि हम भक्ति अवश्य करनी चाहिए लेकिन साथ ही साथ हम अपने कर्तव्यों को अपने उद्देश्य को ना भूलें, क्योंकि हमारे पूर्वजों ने इस सृष्टि को संजोकर हमें दिया था हम अपनी आने वाली पीढ़ी को भी इसी तरह सँजोकर  दे कर जाए, इसके लिए पर्यावरण को वह जल को बचाना बेहद जरूरी है । जिस प्रकार से आज पर्यावरण बहुत भारी संकट की स्थिति से जूझ रहा है,कहीं ना कहीं उसके कारण हम हैं आने वाले कुछ दशकों में जल के व्यवस्थाएं गड़बड़ा जाएंगे मौसम व्यवस्थाएं गड़बड़ा जाएंगे अकालवृष्टि अतिवृष्टि जैसे प्रकृति प्रकोपों के हम शिकार होंगे  ,इसके लिए हमें महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे|

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हम जल को अनावश्यक ना बहाएं हम जल की रक्षा सुरक्षा करें , हम पेड़ पौधों को ना काटे हम उन्हें लगाएं उनकी रक्षा सुरक्षा करें ,हम नदियों को गंदा ना करें आज नर्मदा यमुना गंगा दूषित होती जा रही है ,उसका कहीं ना कहीं कारण हम लोग हैं हम श्रद्धा तो रखते हैं हम मां तो मानते हैं, लेकिन हमारे व्यवहार बिल्कुल भी ठीक नहीं है, हम नदियों के प्रति बड़ा ही उग्र स्वभाव रखते है,जो कि गलत है नदियों में कपड़े धोना साबून इत्यादि का अति उपयोग व  पॉलिथीन कूड़े गंदगी आदि वही पर डाल कर आएंगे, जिनको हम मां कहते हैं|

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विसर्जन करने भी जाएंगे तो हम इको फ्रेंडली मूर्तियों के विग्रह का उपयोग नहीं करते ,बल्कि हम ऐसी मूर्तियां विग्रह का उपयोग करते हैं जो कि नदियों के जल को प्रदूषित व जहरीला बनाते है ,कही न कही प्रकृति के साथ हम गलत कर रहे है। पर्यावरण हमारा जीवन है। अगर हम उस जीवन को खतरे में डाल देंगे तो कहीं ना कहीं हमारा जीवन में खतरे में होगा ।और आने वाली पीढ़ी का जीवन खतरे में हो जाएगा ।तो कम से कम आने वाले भविष्य की पीढ़ियों के विषय में सोचें जो इस संसार में ये सोचकर पैदा होंगे कि उन्हें जल जीवन सुरक्षित मिलेगा, लेकिन जिस तरह से हमारा प्रकृति के साथ गलत व्यवहार हो गया है बड़ा ही सोचनीय विषय है।जिस भारत देश मे सनातन धर्म के ऋषियों ने प्रकृति की पूजा करने की आज्ञा दी,पेड़ पौधे नदियों तलावों पहाड़ जल अग्नि आकाश पृथ्वी जीव जंतु सबको भगवान तुल्य माना क्योंकि इन्हीं सभी से हमारा जीवन सुरक्षित है ,हमने विकास कह कह कर पूरी प्रकृति का विनाश करने में लगे है ।

आने वाली भविष्य की पीढ़ियों को  भी हमारे जैसे जीवन जीने का अधिकार है, हम सुरक्षित भूमि  जल  ऑक्सीजन उनके लिए छोड़े प्रकृति को बचाये, कृपा कर हमें अपने आप को संतुलित करने की आवश्यकता है ,हम विकास का कहकर विनाश की ओर जा रहे हैं| हम चंद्रमा पर जाने की बात तो करते हैं वहाँ पानी खनिज पदार्थ ढूंढने जाते है, लेकिन धरती पर रहते हुए भी उस धरती रक्षा सुरक्षा नही करते जो कि हमारे रहने के लिए उपयुक्त है जो हमारे लिए ही बनी है|

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