संस्कृति व संस्कार ही भारत वासियों की पहचान : कृष्ण प्रिया

बासोपट्टी में भागवत कथा के तीसरे दिन प्रवचन

रौशन कुमार की रिपोर्ट
बासोपट्टी :
आयोजित परम् मंगल श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कृष्णप्रिया जी महाराज ने कहा कि सच्चे हृदय से भागवत कथा सुनने मात्र से न केवल मन में शुद्धता आती है, प्रभु के प्रति प्रेम भी स्वतः ही बढ़ जाता है। ये कथा जीवन परिवर्तन कर देने वाली है।जब आप भाव से भक्ति करते हैं तो आप जीवन में सुखद परिवर्तन स्वयं अनुभव होगा।

धुंधकारी की कथा के माध्यम से बताया कि जीवन मे यदि कोई संतान नहीं है तो ये भी प्रभु की विशेष कृपा है।वे आपको सभी बंधनो से बचाते हैं ताकि हम उनकी भक्ति बिना किसी भटकाव के कर सकें। जीवन में माता पिता का स्थान सर्वक्षेष्ठ बताया गया है। और हमे उनकी सदैव सेवा एवं आज्ञा का पालन करना चाहिए। हमारी संस्कृति और संस्कार ही हम भारतवासियो की पहचान है। लोग दूर दूर से हमारी संस्कृतियों को देखने आते हैं। अपनी संस्कृति पर हम सभी को गर्व करना चाहिए और सह्रदय इसका निर्वहन करना चाहिए। 

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कथा सुनने का सौभाग्य केवल मृत्युलोक में ही प्राप्त है, देवतागण को भी कथा प्राप्त नहीं है। कथा के लिए ही रामभक्त हनुमान प्रभु के साथ न जाकर आज भी इस धरती पर विराजमान हैं। सामान्य जीवनशैली में प्रभु का नाम प्रतिपल स्मरण नहीं हो पाता। अतः कथा के समय प्रभु का नाम एकसाथ जपने से उसका फल हजार गुना बढ़ जाता है। भागवत कथा में सदैव बड़े ध्यान से सुनना चाहिए और उसका चिंतन करना चाहिए, जिससे कथा का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

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इस कलियुग में भागवत कथा सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक है। सत्संग के माहात्म्य का वर्णन करते हुए देवी जी ने बताया कि सत्संग से ही ईश्वर के प्रति प्रेम व लगाव बढ़ता है। सही-गलत में अंतर करने की विवेक देता है सत्संग। जीवन में चाहे कितने भी कष्ट क्यों ना आ जाए लेकिन कभी भी प्रभु की भक्ति करना नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि यह कष्ट हमें हमारे कर्मों से ही प्राप्त होते हैं इनमें प्रभु का कोई हस्तक्षेप नहीं होता। आज लोगों ने ईश्वर को साधन बना लिया है कि ईश्वर अगर सुख देंगे तो ही हम उनकी भक्ति करेंगे यह गलत है। हरि नाम का आश्रय ही भवसागर से पार कर सकता है। भक्ति सदैव निष्काम भावना की होनी चाहिए।

सदैव ईश्वर से मांगते रहना, इच्छा करना, उचित नहीं होता। भक्ति मीराबाई, नरसी,नामदेव,तुलसीदास इत्यादि भक्तों की तरह होनी चाहिए जिसमें प्रभु की कृपा साक्षात प्राप्त होती है ना की सांसारिक सुख के लिए भक्ति की जाए। पितरों को देवताओं से श्रेष्ठ बताया गया है। जीवन में अपने पितरों निम्मित कोई न कोई शुभ कार्य करना, दान करना एवं उनका श्राद्ध करना अत्यंत आवश्यक होता है।

जब आप उनके नाम पर पुण्य कर्म करते हैं, यज्ञ अनुष्ठान इत्यादि करते हैं तो उन्हें भगवतधाम की प्राप्ति होती है। गौमाता की अद्वितीय महिमा बताते हुए देवी जी ने बताया कि इस धरा पर गौमाता साक्षात कृष्ण का स्वरुप हैं। पूर्व में हमारे सनातन धर्म गौमाता को की पूजा की जाती थी लेकिन आज उनकी स्थिति बड़ी ही दयनीय है। उनकी रक्षा करने का दायित्व हमारा है। इसलिए गायो को अवश्य पालें और उनकी सेवा हेतु दान धर्म इत्यादि अवश्य करना चाहिए। देवी जी ने आगे बताया कि बद्रीनाथ धाम तपस्या और ज्ञान की भूमि है।मनुष्य जीवन में बद्रीनाथ जी का दर्शन करना चाहिए। उनके दर्शन के बिना जीवन निष्फल होता है। क्योंकि आज भी नारायण सशरीर  बद्रीनाथ जी में तपस्या कर रहे हैं।

देवी जी ने कथा का आगे वर्णन करते हुए नारदजी वृन्दावन में भक्ति व उनके दो पुत्र ज्ञान और वैराग्य की अद्भुत कथा श्रवण कराते हुए बताया कि वृंदावन में भक्ति की अत्यधिक प्रधानता है यहाँ ज्ञान, वैराग्य को कोई नहीं पूछता। बड़े ही सुंदर एवं मधुर भजनों के साथ पूज्या देवी जी ने तीसरे दिवस की कथा को विश्राम दिया।

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