कर्मो के अनुसार व्यक्ति को मिलता सुख व दुख: श्री कृष्णप्रिया

जीवन मे गुरुकृपा व सत्संग से ईश्वर से साक्षत्कार सम्भव

बासोपट्टी में भागवत कथा प्रवचन के चौथे दिन

फोटो बसोपट्टी 1 कथा प्रवचन करते श्री कृष्ण पिया जी महाराज बासोपट्टी 2 बसोपट्टी में भागवत कथा प्रवचन में उमड़ी महिलाओं की भारी भीड़।

भागवत कथा के चौथे दिन

बासोपट्टी। निज संवाददाता

बासोपट्टी में आयोजित श्रीमद भागवत कथा प्रवचन के वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक श्री कृष्णप्रिया जी महाराज ने कहा कि ईश्वर सभी जगह विद्यमान है लेकिन हमारे मन पर अज्ञानता का पर्दा डाले होने के कारण हम ईश्वर को नहीं देख पाते। जीवन में गुरु कृपाऔर सत्संग के प्रभाव से ही ईश्वर से साक्षात्कार सम्भव है।

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गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों का पालन धर्मपूर्वक करना चाहिए। जैसे, अथितियों का सत्कार, मंदिर इत्यादि में सेवा, सत्य का पालन, गौ माता की सेवा, घर के बुजुर्गों की सेवा, ईश्वर की नित्य नियम से पूजा, इत्यादि कार्यो को गृहस्थ जीवन का कर्तव्य बताया गया। मिथला को पावन भूमि बताते हुए कहा कि मिथिला परम् ज्ञानियों की नगरी है, यहां संत रामहंस, प्रयागदास जैसे अनेक दिव्य गुरु हुए हैं। अतः यह नगरी बड़ी ही दिव्य भूमि है। आगे बताया कि व्यक्ति को सुख-दुख उनके कर्मों के अनुसार ही मिलता है।

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आपके द्वारा वर्तमान में किए हुए कर्म ही भविष्य बनते हैं ।इसमें प्रभु का कोई हस्तक्षेप नहीं होता लेकिन प्रभु की भक्ति करने से आगे का मार्ग सुगम हो जाता है और अगर प्रारब्ध में दुख है तो उन्हें झेलने की शक्ति मनुष्य को प्राप्त होती है। माता पिता की महिमा का व्याख्यान करते हुए युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि जीवन इन्ही से शुरू होता है, ये देवताओं से भी ज्यादा पूजनीय हैं।

अपने माता पिता की आज्ञा का सदैव पालन करें एवम उनकी सेवा करें। भक्ति में भावों की ही प्रधानता होती है। आपकी शारीरिक क्रियाओं से आप भले ही सांसारिक कार्य कर रहे हों लेकिन यदि आपका मन प्रभु में लीन है तो उस समय आप प्रभु की भक्ति ही कर रहे होते हैं|  गंगा का जल शरीर को तो पवित्र कर सकता है लेकिन आपके विचारों एवं मन को केवल सत्संग,प्रभु की कथाओं और भक्ति के द्वारा ही श्रद्धा किया जा सकता है। जैसे व्रत का अर्थ केवल भूखे रहना ही नहीं होता बल्कि पूरे दिन हरि का नाम, हरि का भजन कितना हुआ यह मायने रखता है। इसलिए किसी भी क्रिया में मन का होना अत्यधिक आवश्यक है।

उन्होंने परम सत्य का ज्ञान कराते हुए बताया कि यह शरीर ही सभी बंधनों का कारण है और यह ही मुक्ति का कारण है। अगर आपने अपने मन एवं शरीर को संसार में लगा दिया तो आप सदैव बंधनों में पड़े रहेंगे और अगर भगवान की भक्ति में मन लगा लिया तो आप इस भवसागर से मुक्त हो जाएंगे। कथा को कल्पवृक्ष बताया गया है जो भी हम इच्छा करते हैं वह सच्चे मन से कथा सुनने पर संपूर्ण होती है। इसलिए कथा में सांसारिक इच्छाएं ना करते हुए प्रभु से उनकी भक्ति उनकी शरणागति मांगे।

भगवत कथा आपको भक्ति एवं प्रभु के प्रति प्रेम प्रदान करती है जिससे आप प्रभु के प्रिय होने लगते हैं। कथा का शुभारंभ “राधे गोविंद गोविंद राधे” अत्यंत मधुर संकीर्तन से किया

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